वात्स्यायन का कामसूत्र लोकप्रिय संस्कृति में अक्सर केवल यौन आसनों की पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि मूल ग्रंथ का बड़ा हिस्सा प्रेम, विवाह, सामाजिक व्यवहार, आकर्षण, दांपत्य और शहरी जीवन से जुड़ा है। इसे प्राचीन भारतीय जीवन-कला साहित्य की व्यापक परंपरा में पढ़ना अधिक उचित है।
ग्रंथ परिचय, संदेश, मित्रों की भूमिका, प्रेम-प्रस्ताव, विवाह और दांपत्य व्यवहार पर अनेक टिप्पणियाँ करता है। इनमें से कुछ बातें आधुनिक पाठक को आश्चर्यजनक रूप से परिचित लग सकती हैं, जबकि कुछ स्पष्ट रूप से उस समय की सामाजिक संरचना और लैंगिक असमानताओं से बंधी हैं।
कामसूत्र वर्णनात्मक और निर्देशात्मक दोनों है, लेकिन यह पूरे प्राचीन भारत के व्यवहार का सर्वेक्षण नहीं था। लेखक विशेष सामाजिक वर्गों और शहरी अभिजात जीवन को ध्यान में रखता है। इसलिए उसमें लिखी हर बात को “प्राचीन भारत में ऐसा ही होता था” कहना उचित नहीं है।
ग्रंथ का रोचक पक्ष यह है कि वह इच्छा को मानव जीवन के वैध लक्ष्य—काम—से जोड़ता है, लेकिन उसे धर्म और अर्थ के साथ संतुलित करने की बात भी करता है। प्रेम केवल निजी भावना नहीं, परिवार, प्रतिष्ठा, मित्रों और सामाजिक अपेक्षाओं से जुड़ा व्यवहार है।
इन 29 अवलोकनों को पढ़ते समय तुलना की दृष्टि सबसे उपयोगी है: क्या बदला, क्या नहीं बदला, और किन विचारों को आज हम अस्वीकार्य मानेंगे? ऐसा पढ़ना कामसूत्र को सनसनी से निकालकर सामाजिक इतिहास के स्रोत में बदल देता है।
