11वीं शताब्दी के विद्वान अबू रेहान अल-बिरूनी गणित, खगोल, भूगोल और भाषाओं में गहरी रुचि रखते थे। भारत आने के बाद उन्होंने संस्कृत सीखी और भारतीय दार्शनिक तथा वैज्ञानिक ग्रंथों का अध्ययन किया। उनका “किताब-उल-हिंद” भारतीय समाज को समझने के सबसे महत्वपूर्ण बाहरी प्रयासों में से है।
अल-बिरूनी की विशेषता यह थी कि वे केवल सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर नहीं रहे। उन्होंने ब्राह्मण विद्वानों से संवाद किया और संस्कृत ग्रंथों को पढ़ने का प्रयास किया। यही कारण है कि उनके विवरण में धर्म, गणित, खगोल, भूगोल, जाति और सामाजिक रीति-रिवाजों पर विस्तृत टिप्पणियाँ मिलती हैं।
वे भारतीय गणित और दर्शन से प्रभावित थे, लेकिन सामाजिक अलगाव और विदेशियों के प्रति दूरी की आलोचना भी करते थे। उनके लेखन में उस युग के कुछ सांस्कृतिक पूर्वाग्रह भी दिखाई देते हैं, इसलिए उन्हें पूर्णतः निष्पक्ष आधुनिक नृवंशशास्त्री समझना उचित नहीं है।
अल-बिरूनी का भारत से संपर्क उस समय हुआ जब महमूद ग़ज़नी के सैन्य अभियान चल रहे थे। वे सैनिक आक्रमणों की हिंसा और उसके कारण पैदा हुए अविश्वास का उल्लेख भी करते हैं। यह टिप्पणी उनके ग्रंथ को तत्कालीन राजनीति से जोड़ती है।
किताब-उल-हिंद हमें 11वीं शताब्दी के भारत की “फोटोग्राफ” नहीं देती, बल्कि एक अत्यंत विद्वान बाहरी पर्यवेक्षक की दृष्टि देती है। इसकी ताकत गहरे अध्ययन में है और सीमा यह है कि किसी एक लेखक की पहुँच पूरे भारतीय समाज तक नहीं हो सकती थी।
