सम्राट अशोक के धम्म को किसी एक धार्मिक संप्रदाय का दूसरा नाम समझना सही नहीं है। उनके शिलालेखों में धम्म एक व्यापक नैतिक और सामाजिक नीति के रूप में सामने आता है—जिसमें माता-पिता का सम्मान, प्राणियों के प्रति दया, संयम, उदारता और विभिन्न संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता पर जोर है।

अशोक के अध्ययन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हमारे पास उनके शासन से सीधे जुड़े शिलालेख हैं। चट्टानों और स्तंभों पर लिखे आदेश साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में पाए गए हैं। वे हमें बाद की कथाओं से अलग, शासक द्वारा जनता को दिए गए संदेशों तक पहुँचाते हैं।

अशोक ने धम्म से जुड़े कार्यों के लिए विशेष अधिकारियों—धम्म महामात्रों—का उल्लेख किया। उनका उद्देश्य विभिन्न सामाजिक समूहों की देखभाल, नैतिक आचरण को प्रोत्साहन और कल्याणकारी गतिविधियों पर ध्यान देना था।

कुछ शिलालेख पशु-वध को सीमित करने और जीवों के प्रति करुणा की बात करते हैं। इसे आधुनिक अर्थ में पूर्ण अहिंसा कानून कहना सही नहीं होगा, लेकिन राजकीय नैतिकता में हिंसा कम करने की स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है।

अशोक ने अपने संप्रदाय की प्रशंसा और दूसरे की निंदा से बचने की सलाह दी। धम्म आधुनिक संविधान या धर्मनिरपेक्षता नहीं था, लेकिन तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व की राजकीय भाषा में सहिष्णुता और नैतिक आत्मसंयम पर उसका जोर उल्लेखनीय है।

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