1814 में शुरू हुए एंग्लो-गोरखा युद्ध में देहरादून के पास नालापानी या खलंगा की घेराबंदी सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में से एक बनी। छोटी गोरखा टुकड़ी का नेतृत्व बलभद्र कुँवर कर रहे थे, जबकि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के पास कहीं अधिक सैनिक और तोपखाना था।
खलंगा आधुनिक विशाल पत्थर के किले जैसा नहीं था, बल्कि पहाड़ी स्थिति का लाभ लेने वाला रक्षात्मक गढ़ था। भीतर सैनिकों के साथ महिलाएँ और बच्चे भी मौजूद थे। सीमित संसाधनों के बावजूद रक्षकों ने कई दिनों तक प्रतिरोध किया।
ब्रिटिश सेना ने सीधे हमले का प्रयास किया, लेकिन कठिन भूभाग और दृढ़ रक्षा के कारण भारी नुकसान हुआ। मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो गिलेस्पी स्वयं हमले के दौरान मारे गए। यह घटना ब्रिटिश सेना के लिए बड़ा झटका थी।
सीधे हमले में सफलता न मिलने पर ब्रिटिश पक्ष ने किले की जल-आपूर्ति पर नियंत्रण करने की रणनीति अपनाई। प्यास और संसाधनों की कमी ने रक्षकों की स्थिति असहनीय कर दी। अंततः बलभद्र और बचे हुए सैनिक किले से निकल गए; उन्होंने औपचारिक आत्मसमर्पण नहीं किया।
नालापानी की विशेषता यह है कि ब्रिटिश सैन्य लेखन में भी गोरखा रक्षकों की बहादुरी की प्रशंसा मिलती है। बाद में ब्रिटिश सेना ने गोरखा सैनिकों की युद्धक्षमता को गंभीरता से लिया। बलभद्र कुँवर की स्मृति आज भी साहस और असंभव परिस्थितियों में प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में जीवित है।
