16 मार्च 1527 को खानवा के मैदान में मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह, यानी राणा सांगा, और ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर की सेनाएँ आमने-सामने आईं। पानीपत की विजय के बाद बाबर दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर चुका था, लेकिन उत्तर भारत में उसकी स्थिति अभी स्थायी नहीं हुई थी। राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत सरदारों और सहयोगी शक्तियों का बड़ा संघ उसके सामने सबसे गंभीर चुनौती था।

राणा सांगा लंबे सैन्य जीवन से गुज़रे अनुभवी सेनानायक थे। परंपरागत विवरण उनके शरीर पर अनेक पुराने घावों, एक आँख की क्षति और हाथ-पैर की गंभीर चोटों का उल्लेख करते हैं। अलग-अलग स्रोत इन घावों की संख्या और प्रकृति अलग बताते हैं, पर उनकी ऐतिहासिक छवि एक ऐसे योद्धा की है जो बार-बार घायल होने के बावजूद सक्रिय रहा।

बाबर की ताकत केवल तोपों में नहीं थी, बल्कि उन्हें मैदान में व्यवस्थित तरीके से उपयोग करने में थी। उसने गाड़ियों या अरबा को जोड़कर रक्षात्मक रेखा बनाई, उनके बीच तोपों और बंदूकधारियों के लिए रास्ते छोड़े और घुड़सवार टुकड़ियों को पंखों पर रखा। इसके विपरीत राजपूत सेना की शक्ति तेज़ घुड़सवार प्रहार, निकट युद्ध और व्यक्तिगत साहस में थी।

खानवा में राजपूत दस्तों ने मुगल मोर्चे पर बार-बार दबाव बनाया। तोपों की गर्जना, धुएँ और गोलाबारी के बीच भी आक्रमण जारी रहे। युद्ध को केवल “तोप बनाम तलवार” कहना बहुत सरल होगा; वास्तव में यह दो अलग सैन्य प्रणालियों की टक्कर थी—एक ओर तीव्र आक्रामक प्रहार, दूसरी ओर योजनाबद्ध रक्षात्मक-आक्रामक संरचना।

अंततः बाबर की सेना ने युद्ध अपने पक्ष में कर लिया। राणा सांगा जीवित बच निकले, लेकिन राजपूत संघ की सामूहिक चुनौती टूट गई। खानवा ने बाबर को दिल्ली-आगरा क्षेत्र पर अपनी सत्ता मजबूत करने का अवसर दिया। दूसरी ओर राणा सांगा की स्मृति उस जुझारू प्रतिरोध से जुड़ी रही जिसने शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी के सामने निर्णायक युद्ध चुना।

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