ग़ियासुद्दीन बलबन के सत्ता में आने से पहले दिल्ली सल्तनत आंतरिक गुटबाज़ी, प्रांतीय विद्रोह और मंगोल दबाव से जूझ रही थी। बलबन पहले शक्तिशाली अमीर था और 1266 में सुल्तान बना। शासन का उसका विचार कठोर अनुशासन और राजकीय प्रतिष्ठा पर आधारित था।
इल्तुतमिश के समय से प्रभावशाली तुर्क अमीरों का समूह दरबार की राजनीति में महत्वपूर्ण था। बलबन ने ऐसे कुलीन गुटों की स्वतंत्र शक्ति सीमित की और सुल्तान की केंद्रीय सत्ता को ऊपर रखा। उसका संदेश स्पष्ट था—शासक अमीरों में केवल “पहला” नहीं, बल्कि उनसे ऊपर है।
दरबार में सिजदा-पैबोस जैसी रस्मों और कठोर अनुशासन को उसकी राजकीय विचारधारा से जोड़ा जाता है। उसने शासक के चारों ओर दूरी, भय और प्रतिष्ठा का वातावरण बनाया। बरनी के लेखन में उसका कठोर रूप विशेष रूप से उभरता है।
मंगोल आक्रमणों का खतरा लगातार बना हुआ था। बलबन ने उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की रक्षा मजबूत की, सैनिक चौकियाँ व्यवस्थित कीं और सीमांत क्षेत्रों में अनुभवी सेनापति नियुक्त किए। उसके पुत्र मुहम्मद की मंगोलों से लड़ते हुए मृत्यु इस खतरे की गंभीरता दिखाती है।
दिल्ली के आसपास मेवात और दोआब में भी उसने सैन्य अभियान चलाए। बलबन ने साम्राज्य को सबसे अधिक भूभाग नहीं दिया, लेकिन केंद्रीय सत्ता, शाही प्रतिष्ठा और सीमा-सुरक्षा को मजबूत करने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
