सिकंदर लोदी (1489–1517) को कई मध्यकालीन स्रोत सक्रिय और अनुशासनप्रिय शासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उसके न्याय से जुड़ी अनेक कहानियाँ बाद के इतिहासलेखन में मिलती हैं। इन कथाओं का उद्देश्य केवल घटना बताना नहीं, बल्कि यह दिखाना भी था कि आदर्श सुल्तान से कैसा व्यवहार अपेक्षित था।
दरबारी किस्सों में अक्सर सुल्तान को शक्तिशाली अमीरों के विरुद्ध सामान्य प्रजा की शिकायत सुनते दिखाया जाता है। ऐसी कथाएँ शासक की निष्पक्षता का नैतिक संदेश देती हैं। जरूरी नहीं कि हर प्रसंग शब्दशः उसी तरह घटा हो; मध्यकालीन इतिहासलेखन में आदर्श उदाहरणों की शैली सामान्य थी।
सिकंदर ने अधिकारियों पर नियंत्रण, बाजार और राजस्व मामलों में निगरानी तथा राज्य की प्रतिष्ठा बनाए रखने पर जोर दिया। आगरा को विकसित करने का श्रेय भी उसे दिया जाता है, जिसने आगे मुगल काल में बड़ी राजनीतिक भूमिका निभाई।
उसे केवल न्यायप्रिय कहकर छोड़ना अधूरा होगा। कुछ स्रोत उसकी धार्मिक कठोरता और हिंदू धार्मिक संस्थानों के प्रति दमनात्मक कार्यों का भी उल्लेख करते हैं। इसलिए उसकी शासन-छवि में प्रशासनिक क्षमता और धार्मिक असहिष्णुता के प्रसंग दोनों मौजूद हैं।
राजाओं के बारे में न्याय-कथाएँ हमें दो चीजें बताती हैं—शासक वास्तव में क्या करता था, और समाज एक अच्छे शासक से क्या उम्मीद करता था। सिकंदर लोदी के किस्सों को इसी दोहरी दृष्टि से पढ़ना सबसे उपयोगी है।
