महाराणा प्रताप का जन्म 1540 ई. में मेवाड़ के शासक उदयसिंह द्वितीय और जयवंताबाई के पुत्र के रूप में हुआ। 1572 में वे मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय अकबर का साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था और अनेक राजपूत राज्यों ने मुगल सत्ता से अलग-अलग प्रकार के संबंध स्वीकार कर लिए थे। मेवाड़ ने राजनीतिक अधीनता स्वीकार नहीं की।
उदयसिंह की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार सरल नहीं था। परंपरा के अनुसार कुछ दरबारी गुट जगमाल का समर्थन करते थे, लेकिन मेवाड़ के प्रभावशाली सरदारों ने प्रताप को शासन के लिए अधिक उपयुक्त माना। गोगुंदा में उनका राज्यारोहण हुआ और जल्द ही उन्हें मुगल दबाव का सामना करना पड़ा।
अकबर ने युद्ध से पहले प्रताप को समझौते के लिए मनाने के कई प्रयास किए। विभिन्न दूतों और राजपूत सरदारों को भेजा गया, लेकिन ऐसा समझौता नहीं हो सका जिसमें प्रताप मुगल अधीनता स्वीकार करते। यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत वैर नहीं, बल्कि मेवाड़ की राजनीतिक स्वायत्तता के प्रश्न से जुड़ा था।
1576 का हल्दीघाटी युद्ध प्रताप के जीवन का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग है, पर उनकी कहानी वहीं समाप्त नहीं होती। युद्ध के बाद भी वे सक्रिय रहे, पहाड़ी और वन क्षेत्रों से संघर्ष जारी रखा और बाद के वर्षों में मेवाड़ के बड़े हिस्से पर फिर से नियंत्रण स्थापित किया। चावंड उनका महत्वपूर्ण केंद्र बना।
बाद की राजस्थानी परंपरा में प्रताप स्वतंत्रता, कठिन जीवन और अडिग संकल्प के प्रतीक बने। चेतक, भामाशाह और घास की रोटी जैसी लोकप्रिय कथाएँ इसी स्मृति का हिस्सा हैं। इनमें ऐतिहासिक तथ्य, लोककथा और नैतिक आदर्श कई बार एक-दूसरे में घुल जाते हैं; इसलिए हर कथा को उसके स्रोत के साथ पढ़ना चाहिए।
महाराणा प्रताप के दृश्य पुनर्निर्माण में 16वीं शताब्दी के मेवाड़ी सैन्य परिधान, पगड़ी या खुलाहुद, जिरह-बख्तर, ढाल, भाला और तलवार जैसे तत्व ही उपयुक्त हैं। आधुनिक पोशाक या फिल्मी कल्पना को ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
