14वीं शताब्दी के प्रसिद्ध मोरक्कोवासी यात्री इब्न बतूता ने हजारों किलोमीटर की यात्राएँ कीं और भारत भी पहुँचे। दिल्ली में सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने उनकी विद्वत्ता को महत्व दिया और उन्हें काज़ी का पद दिया। उनके यात्रा-वृत्त “रिहला” से तुगलककालीन भारत की जीवंत झलक मिलती है।
इब्न बतूता के लिए मुहम्मद बिन तुगलक आकर्षक और भयावह दोनों था। वह सुल्तान की उदारता, विशाल दान और बौद्धिक रुचि का वर्णन करता है, साथ ही कठोर दंड और अचानक बदलते निर्णयों की घटनाएँ भी लिखता है। इस कारण रिहला से तुगलक की जटिल छवि उभरती है।
यात्रा-वृत्त में दिल्ली की समृद्धि, बाजारों, डाक व्यवस्था, यात्रा-सुविधाओं और सामाजिक जीवन के विवरण मिलते हैं। इब्न बतूता भारत की दूरी और विविधता से प्रभावित था। उसके वर्णन में कई बार आश्चर्य की भाषा है—जो एक बाहरी यात्री की दृष्टि को दर्शाती है।
दिल्ली से निकलने के बाद उसकी यात्रा मालदीव, श्रीलंका और अन्य क्षेत्रों तक गई। उसे चीन के लिए दूत के रूप में भी भेजा गया। भारतीय महासागर की यह यात्रा उस समय के समुद्री संपर्क और लंबी दूरी की गतिशीलता का प्रमाण है।
इब्न बतूता उत्कृष्ट कथाकार था, पर हर घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। कुछ कथाएँ उसने दूसरों से सुनीं और यात्रा-वृत्त बाद में लिखवाया गया। इसलिए उसका विवरण अत्यंत मूल्यवान है, लेकिन उसे अन्य स्रोतों से मिलाकर पढ़ना चाहिए।
