1567 में अकबर ने चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी शुरू की। मेवाड़ के शासक उदयसिंह द्वितीय पहाड़ी क्षेत्रों की ओर हट गए, लेकिन दुर्ग की रक्षा जयमल और पत्ता जैसे सेनानायकों के नेतृत्व में जारी रही। चित्तौड़ केवल किला नहीं था; यह सिसोदिया राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था।
ऊँची पहाड़ी पर स्थित चित्तौड़ सीधे हमले के लिए कठिन था। मुगल सेना ने खाइयाँ, ढके हुए रास्ते, तोपखाना और “साबात” जैसी घेराबंदी तकनीकों का उपयोग किया। उद्देश्य धीरे-धीरे किले की दीवारों तक सुरक्षित पहुँच बनाना और रक्षकों पर लगातार दबाव रखना था।
राजस्थानी परंपरा में जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया की वीरता अत्यंत प्रसिद्ध है। अकबरनामा भी मुगल पक्ष की कठिनाइयों और किले की रक्षा का उल्लेख करता है। जयमल की मृत्यु से जुड़ा अकबर द्वारा स्वयं गोली चलाने का प्रसिद्ध दावा मुगल स्रोत में मिलता है, पर आधुनिक इतिहासकार इस पर सावधानी से विचार करते हैं।
किले की स्थिति निराशाजनक होने पर जौहर और अंतिम साका की स्मृति राजपूत परंपरा में दर्ज हुई। इसके बाद मुगल सेना ने किले पर अधिकार कर लिया। विजय के बाद बड़े पैमाने पर हत्याओं का उल्लेख स्रोतों में मिलता है; संख्या के दावों में अंतर है, पर हिंसा की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चित्तौड़ की विजय अकबर की राजपूताना नीति में महत्वपूर्ण थी, लेकिन मेवाड़ का प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ। कुछ ही वर्षों बाद महाराणा प्रताप ने संघर्ष को आगे बढ़ाया। इस प्रकार 1568 का पतन सैन्य विजय था, पर सिसोदिया स्वायत्तता की राजनीतिक परंपरा का अंत नहीं।
