मध्यकालीन इतिहासकार शासकों से न्याय, अनुशासन और ईमानदारी की अपेक्षा करते थे, लेकिन उनके अपने विवरण बताते हैं कि प्रशासन में रिश्वत, पदों की खरीद, कर-वसूली में गड़बड़ी और दरबारी पक्षपात जैसी समस्याएँ भी मौजूद थीं। दिल्ली सल्तनत भी इससे अछूती नहीं थी।
सल्तनत का शासन विस्तृत भूभाग पर फैला था। संचार धीमा था, स्थानीय अधिकारी शक्तिशाली थे और केंद्र को अक्सर उनकी रिपोर्टों पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे वातावरण में राजस्व, सैन्य वेतन और नियुक्तियों में हेरफेर की गुंजाइश रहती थी।
ज़ियाउद्दीन बरनी जैसे लेखक केवल घटनाएँ नहीं बताते, बल्कि राजनीतिक नैतिकता पर टिप्पणी भी करते हैं। वे योग्य अधिकारियों की नियुक्ति, भ्रष्ट अमीरों पर नियंत्रण और शासक की सीधी निगरानी पर जोर देते हैं। ऐसे स्रोतों में नैतिक उपदेश की शैली भी होती है, इसलिए उन्हें सावधानी से पढ़ना चाहिए।
दरबार में पहुँच, सिफारिश और व्यक्तिगत संबंध शक्ति के महत्वपूर्ण साधन थे। प्रशासनिक पद प्रतिष्ठा, आय और राजनीतिक प्रभाव का स्रोत थे, इसलिए उन्हें पाने की प्रतिस्पर्धा अनुचित लेन-देन को जन्म दे सकती थी।
इन कथाओं की रोचकता यह है कि कुछ समस्याएँ बहुत आधुनिक लगती हैं—फर्जी रिकॉर्ड, प्रभावशाली लोगों का दबाव और कर-वसूली में मनमानी। फिर भी आधुनिक “भ्रष्टाचार” की अवधारणा को सीधे मध्यकाल पर चिपकाने के बजाय उस समय की प्रशासनिक संरचना को समझना अधिक उपयोगी है।
