महरौली के पास स्थित सुल्तान ग़ारी 13वीं शताब्दी का महत्वपूर्ण मकबरा-परिसर है। इसे इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद की स्मृति में बनवाया माना जाता है और इसका निर्माण लगभग 1231 ई. से जोड़ा जाता है।
इसे अक्सर भारत का पहला इस्लामी मकबरा कहा जाता है, लेकिन ऐसे पूर्ण दावों में सावधानी चाहिए। अधिक सटीक रूप में इसे दिल्ली सल्तनत काल के सबसे पुराने सुरक्षित और महत्वपूर्ण मकबरा परिसरों में गिना जा सकता है।
सुल्तान ग़ारी का परिसर दुर्ग जैसा दिखाई देता है। पत्थर की दीवारें, आंगन और भूमिगत समाधि इसे बाद के सामान्य गुंबददार मकबरों से अलग बनाते हैं। निर्माण में स्थानीय शिल्प और प्रारंभिक सल्तनती स्थापत्य के मेल के संकेत मिलते हैं।
इल्तुतमिश का पुत्र नासिरुद्दीन महमूद बंगाल क्षेत्र में शासन से जुड़ा था और उसकी असमय मृत्यु हुई। शाही परिवार के लिए यह स्मारक केवल निजी शोक नहीं, बल्कि नई सल्तनत की राजकीय उपस्थिति का प्रतीक भी था।
सुल्तान ग़ारी दिल्ली की उन जगहों में है जहाँ कुतुब परिसर की प्रसिद्धि से दूर शुरुआती सल्तनती वास्तुकला का प्रयोगशील रूप देखा जा सकता है। यह स्थानीय तकनीक और नई राजकीय परंपराओं के लंबे संवाद की कहानी कहता है।
