1947 में भारत और पाकिस्तान के गठन के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर का प्रश्न सैन्य संघर्ष में बदल गया। कबायली आक्रमण, रियासत की अनिश्चित स्थिति और महाराजा हरि सिंह के भारत में विलय-पत्र ने घटनाओं को तेजी से बदल दिया। भारतीय सेना को बहुत कम तैयारी समय में हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुँचाया गया।
मेजर जनरल ओ. एस. कलकट जैसे अधिकारियों के संस्मरण हमें आधिकारिक युद्ध-इतिहास से अलग सैनिक अनुभव और निर्णय-प्रक्रिया की झलक देते हैं। संस्मरण में लेखक अपनी दृष्टि, स्मृति और बाद की समझ से घटनाएँ चुनता है, इसलिए उसे अन्य अभिलेखों के साथ पढ़ना चाहिए।
विभाजन के समय पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा और रियासतों में सूचना तेजी से बदल रही थी। सैन्य इकाइयाँ भी विभाजित हो रही थीं। ऐसे वातावरण में अफवाह, अधूरी रिपोर्ट और राजनीतिक निर्णय सीधे सैन्य कार्रवाई को प्रभावित कर सकते थे।
1947-48 का संघर्ष केवल श्रीनगर की रक्षा तक सीमित नहीं था। बारामूला, उड़ी, पुंछ, नौशेरा, लेह और ज़ोजिला जैसे मोर्चों पर भूगोल और मौसम स्वयं सैन्य चुनौती थे।
व्यक्तिगत संस्मरण की सबसे बड़ी ताकत उसका प्रत्यक्ष अनुभव है और सबसे बड़ी सीमा भी यही है—लेखक वही देखता है जो उसकी भूमिका और स्थान उसे देखने देते हैं। इसलिए ऐसे वृत्तांत को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि 1947 के जटिल सैन्य इतिहास की महत्वपूर्ण आवाज़ के रूप में पढ़ना चाहिए।
