18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में नेपाल का गोरखा राज्य तेजी से पश्चिम की ओर फैल रहा था। कुमाऊँ के बाद गढ़वाल भी उसके सैन्य दबाव में आया। 1803 के विनाशकारी भूकंप से कमजोर गढ़वाल राज्य की स्थिति और कठिन हो गई।

गढ़वाल के राजा प्रद्युम्न शाह ने गोरखा विस्तार का प्रतिरोध किया। निर्णायक संघर्ष में वे मारे गए और गोरखा नियंत्रण स्थापित हुआ। इसके साथ ही गढ़वाल राजवंश को मैदानी क्षेत्रों की ओर हटना पड़ा।

स्थानीय परंपराओं और बाद के लेखन में 1803 से 1815 के गोरखा शासन को कठोर कर-वसूली, श्रम और दमन की स्मृतियों से जोड़ा गया है। लोकस्मृति में “गोरख्याणी” शब्द इस कठिन काल के लिए प्रयोग होता है। इन विवरणों को क्षेत्रीय स्मृति और प्रशासनिक स्रोतों के साथ मिलाकर पढ़ना चाहिए।

ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सीमा-विवाद अंततः 1814 में युद्ध में बदल गया। पश्चिमी हिमालय में कंपनी की सेना ने कई मोर्चों पर अभियान चलाया। गढ़वाल के निर्वासित राजवंश ने भी इस संघर्ष में अवसर देखा।

युद्ध के बाद गढ़वाल का एक भाग ब्रिटिश नियंत्रण में चला गया, जबकि राजवंश को पश्चिमी हिस्से में टिहरी गढ़वाल राज्य मिला। इस प्रकार गोरखा शासन समाप्त हुआ, लेकिन पुराना गढ़वाल राज्य अपने पूर्व रूप में पुनर्स्थापित नहीं हुआ। यह काल आज भी गढ़वाल-कुमाऊँ की ऐतिहासिक स्मृति में गहराई से मौजूद है।

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