1191 के तराइन के पहले युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना ने मुहम्मद घोरी को पराजित किया था। अगले ही वर्ष घोरी अधिक तैयारी के साथ लौटा और दूसरा युद्ध उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुआ। सवाल यह है कि एक वर्ष में परिणाम इतना बदल कैसे गया।
राजपूत सेना की शक्ति भारी घुड़सवार, हाथी और निकट युद्ध में थी। घोरी की सेना मध्य एशियाई-ईरानी घुड़सवार तीरंदाजी और अधिक गतिशील युद्ध शैली से परिचित थी। खुले मैदान में तेज़ घोड़े, दूरी से तीर और दिशा बदलने की क्षमता महत्वपूर्ण लाभ बन सकती थी।
फारसी इतिहासलेखन में घोरी द्वारा सेना को विभिन्न टुकड़ियों में बाँटकर लगातार हमला और पीछे हटने की रणनीति का उल्लेख मिलता है। इससे राजपूत पंक्तियाँ लंबी लड़ाई में थक सकती थीं और गठन टूटने पर आरक्षित दस्ते निर्णायक प्रहार कर सकते थे।
बाद की लोककथाओं में सोते हुए हमले, विश्वासघात और कई नाटकीय विवरण मिलते हैं। उन्हें समकालीन स्रोतों से अलग पहचानना जरूरी है। किसी बड़े युद्ध की हार को केवल एक गलती या एक व्यक्ति की कमजोरी से समझाना आकर्षक है, पर प्रायः वास्तविक कारण अनेक होते हैं।
तराइन के बाद घोरी की शक्ति दिल्ली-अजमेर क्षेत्र में मजबूत हुई। उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने आगे विस्तार किया और आने वाले दशकों में दिल्ली सल्तनत की नींव बनी। पृथ्वीराज का ऐतिहासिक जीवन और बाद की वीरगाथा—दोनों अलग स्रोत-परंपराएँ हैं और दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए।
