पुणे के पास स्थित कोंढाणा किला रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। पुरंदर की संधि के बाद यह मुगल नियंत्रण में चला गया था। जब छत्रपति शिवाजी ने अपने खोए किलों को वापस लेने का अभियान तेज़ किया, तो कोंढाणा भी प्रमुख लक्ष्य बना।

तानाजी मालुसरे शिवाजी के विश्वस्त मावला सरदारों में थे। मराठी परंपरा के अनुसार जब कोंढाणा अभियान का दायित्व उन्हें मिला, तब वे पारिवारिक विवाह की तैयारी में थे, लेकिन उन्होंने पहले सैन्य कर्तव्य को चुना। इस प्रसंग का लोकप्रिय रूप लोककथा और बाद की साहित्यिक स्मृति से भी प्रभावित है।

मावला सैनिकों ने किले की कठिन ढलान और अपेक्षाकृत कम सुरक्षित दिशा से ऊपर चढ़ने का प्रयास किया। लोकप्रिय कथा में “यशवंती” नाम की घोरपड़ का उल्लेख आता है, किंतु इतिहासकार इस विवरण को निश्चित प्रमाण के साथ स्वीकार नहीं करते। इतना स्पष्ट है कि हमला अत्यंत जोखिमपूर्ण और निकट युद्ध वाला था।

किले की मुगल चौकी का नेतृत्व उदयभान राठौड़ से जोड़ा जाता है। युद्ध में तानाजी मारे गए, किंतु मराठा सैनिकों ने संघर्ष जारी रखा और किले पर अधिकार कर लिया। शिवाजी से जुड़ा प्रसिद्ध वाक्य “गढ़ आला पण सिंह गेला” बाद की स्मृति में इस विजय की कीमत का प्रतीक बन गया।

कोंढाणा बाद में सिंहगढ़ नाम से अधिक प्रसिद्ध हुआ। तानाजी की कहानी मराठा इतिहास में व्यक्तिगत साहस और सामूहिक अनुशासन का प्रतीक है, लेकिन रोचक लोककथाओं और प्रमाणित घटनाओं में अंतर बनाए रखना इतिहास की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।

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