वाजिद अली शाह को औपनिवेशिक लेखन में लंबे समय तक ऐसे कमजोर और विलासी शासक के रूप में दिखाया गया जिसे शासन की चिंता नहीं थी। आधुनिक इतिहासलेखन इस चित्र को अधिक जटिल मानता है। वे कला, संगीत, नृत्य, कविता और लखनऊ की विशिष्ट सांस्कृतिक दुनिया के बड़े संरक्षक थे।
वे 1847 में अवध के शासक बने। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी राज्य की राजनीति और सैन्य व्यवस्था में गहरा हस्तक्षेप कर रही थी। कंपनी के रेजिडेंट और कलकत्ता प्रशासन लगातार शासन-सुधार के नाम पर दबाव बनाए हुए थे।
1856 में लॉर्ड डलहौज़ी की सरकार ने “कुशासन” का आरोप लगाकर अवध का विलय कर लिया। यह Doctrine of Lapse का मामला नहीं था; कंपनी ने प्रशासनिक अक्षमता को आधार बनाया। वाजिद अली शाह को सत्ता से हटाकर कलकत्ता भेज दिया गया।
वे स्वयं कवि और रचनाकार थे। कथक, ठुमरी, संगीत और नाट्य-प्रदर्शन से उनका नाम जुड़ा है। कृष्ण-लीला से प्रेरित “रहस” जैसे प्रदर्शन अवध की मिश्रित सांस्कृतिक दुनिया का रोचक उदाहरण हैं।
कलकत्ता के पास मटियाबुर्ज में निर्वासन के दौरान उन्होंने लखनऊ की सांस्कृतिक दुनिया का एक नया केंद्र विकसित किया। उनकी प्रशासनिक सीमाओं पर चर्चा हो सकती है, लेकिन ब्रिटिश विलय को सही ठहराने के लिए बनाई गई caricature को इतिहास का अंतिम शब्द नहीं माना जा सकता।
