19वीं शताब्दी के ब्रिटिश अभिलेखों में “ठगी” ऐसे संगठित गिरोहों से जुड़ी बताई गई जो यात्रियों से मित्रता करके उन्हें लूटते और कई मामलों में हत्या करते थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे व्यापक गुप्त नेटवर्क के रूप में प्रस्तुत किया। इस चित्र का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक रिकॉर्ड से आता है, इसलिए इतिहासकार इसकी सीमा और अतिशयोक्ति पर भी चर्चा करते हैं।

कर्नल विलियम हेनरी स्लीमन को ठगी-विरोधी अभियानों से विशेष प्रसिद्धि मिली। मुखबिरों, गिरफ्तार सदस्यों की गवाही, मार्गों की निगरानी और विभिन्न रियासतों से सहयोग के माध्यम से प्रशासन ने संदिग्ध गिरोहों को पकड़ना शुरू किया।

औपनिवेशिक जांच में पकड़े गए कुछ व्यक्तियों को सरकारी गवाह बनाया गया। उनकी गवाही के आधार पर नेटवर्क, मार्ग और कथित साथी पहचाने गए। लेकिन ऐसे बयान दंड से बचने की इच्छा से प्रभावित हो सकते थे, इसलिए आधुनिक इतिहासकार उन्हें सावधानी से पढ़ते हैं।

पुराने ब्रिटिश विवरणों ने ठगों को अक्सर देवी काली के गुप्त धार्मिक पंथ से जोड़ दिया। बाद के शोध ने दिखाया कि अपराध, पेशा, सामाजिक संबंध और औपनिवेशिक कल्पना का मिश्रण इससे अधिक जटिल था। सभी डकैत या हत्यारे एक समान धार्मिक संगठन का हिस्सा नहीं थे।

1830-40 के दशकों में व्यापक गिरफ्तारियों और कड़े नियंत्रण ने उन मार्ग-आधारित गिरोहों की गतिविधियाँ गंभीर रूप से कम कीं जिन्हें प्रशासन “ठग” कहता था। स्लीमन की सफलता वास्तविक प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़ी थी, लेकिन पूरी कहानी औपनिवेशिक राज्य द्वारा अपराध को परिभाषित करने की प्रक्रिया से भी जुड़ी है।

संपादकीय टिप्पणी: मूल लेख की विषयवस्तु को हिंदी प्रकाशन के लिए पुनर्लिखा और भाषा की दृष्टि से संपादित किया गया है। विवादित दावों में सावधानीपूर्ण शब्दावली रखी गई है।